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सोलह श्राद्ध का महत्व। पितृ पक्ष में ध्यान रखें इन बातों का |

श्राद्ध में पितरों को याद किया जाता है तथा उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।  पितृ तर्पण के लिए सनातन धर्म में पितृ पक्ष का खास महत्व है, इसलिए हर वर्ष सोलह श्राद्ध का समय भाद्र पद मास की पूर्णिमा तिथि से शुरू माना जाता है, वहीं  इसका समापन अश्विन अमावस्या के दिन होता है । Astrology Classes Online for free वैदिक ज्योतिष विद्या के अनुसार जब सूर्य का प्रवेश कन्या राशि में होता है, उस दौरान पितृ पक्ष मनाया जाता है। पंचम भाव हमारे पूर्व जन्म के कर्मो के बारे मैं इंगित करता है तथा काल पुरुष की कुंडली में पंचम भाव का स्वामी सूर्य माना जाता है इसलिए सूर्य को हमारे कुल के लिए भी देखा जाता है । मान्यताओं के अनुसार, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है तो सभी पितृ एक साथ मिलकर अपने पुत्रों और पोत्रो (पोते) यानि अपने वंशजों  के द्वार पर पहुंच जाते हैं। इसी दौरान आने वाली अश्विन अमावस्या को यदि उनका श्राद्ध नही किया जाता है तो वह कुपित होकर अपने वंशजों को श्राप देकर लौट जाते है । यही वजह है कि उन्हें फूल, फल और जल आदि के मिश्रण से तर्पण देना चाहिए तथा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उनकी प्रशंसा और तृप्ति के लिए यथासंभव प्रयास चाहिए।    पितृपक्ष का महत्व और श्राद्ध के दिनों में पितृ दोष से मुक्ति– हिन्दू धर्म के अनुसार साल में एक बार मृत्यु के देवता यमराज सभी आत्माओं को पृथ्वी लोक पर भेजते हैं । इस समय ये सभी आत्माएं अपने परिवार जनों से अपना तर्पण लेने के लिए धरती पर आती है। ऐसे में जो व्यक्ति अपने पितरों का श्राद्ध से तर्पण नही करता है उससे उसके पितृ नाराज़ हो जाते हैं । इसलिए पितृ पक्ष के दौरान पितृ तर्पण जरूर करना चाहिए । पितृ पक्ष में पितरों के लिए श्रद्धा से तर्पण करने से जहां पितरों का आशीर्वाद होता है, वही परिवार के सदस्यों की तरक्की का रास्ता खुलता है और साथ ही पितृ दोष का निवारण होता है । कहा जाता हैं की जिस घर में पितृ दोष लग जाता है उस घर में लड़के पैदा नही होते। जिनके हम वंशज हैं जिनसे होकर हम अपनी धर्म और संस्कृति को जान पाए हैं, उन्होंने कितने संघर्ष करते हुए हमारे धर्म और संस्कृति को बचाए रखा है तथा कई तरह की उनकी बनाई हुई चल अचल सम्पत्ति का आज हम भोग कर रहे हैं।  इन सभी कारणों से हम पितरों के ऋणी है और इसलिए श्राद्ध पक्ष के 15 दिन हम पितरों के प्रति ही दान पुण्य करते हैं । पितृ पक्ष में सर्व पितृ अमावस्य का महत्व बहुत अधिक है । कहते हैं इस दिन भूले सभी पितरों के लिए तर्पण किया जाना चाहिए । जिन लोगों को अपने पितरों की मृत्यु तिथि नही पता होती है उन लोगों को भी सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करना चाहिए । सनातन धर्म में कहा जाता है कि तर्पण एक बहुत जरूरी क्रिया है जिससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है ।     पितृतर्पण की विधि– जिस भी तिथि को आपके पितृ देव का श्राद्ध हो उस दिन बिना साबुन लगाए स्नान करें और बिना प्याज लहुसन डाले अपने पितृ देव के पसंद भोजन या आलु, पुड़ी और खिर बनाकर एक थाल में रखें तथा पानी भी साथ  में रखें। इसके बाद हाथ में पानी लेकर तीन बार थाल में घुमायें। पितरों का ध्यान कर उन्हे प्रणाम करें तथा साथ में दक्षिणा रखकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान दें और गाय, कुत्ते , चिटी के लिए भी भोजन निकाले । पितृपक्ष कबसे से आरंभ होगा– पंचाग के अनुसार, इस वर्ष पितृ पक्ष 20 सितंबर सोमवार को भाद्र पद मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से आरंभ हो रहा है जिसका का समापन 6 अक्टूबर बुधवार को अश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर होगा । पितृपक्ष में ना करे यें 5 गलतियां– (1) बाल ना कटवायें मान्यता है कि जो लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध या तर्पण करते हैं उन्हें पितृ पक्ष के 15 दिन अपने बाल नही कटवाने चाहिए। ऐसा करने से पूर्वज नाराज हो जाते हैं । (2) किसी भिखारी को घर से खाली हाथ ना लौटायें  कहा जाता है की पितृ पक्ष में पूर्वज किसी भी वेष में अपना भाग लेने आ सकते हैं । इसलिए दरवाजे पर कोई भिखारी आए तो उसे खाली हाथ नही लौटाना चाहिए । इन दिनों में किया हुआ दान पूर्वजों को तृप्ति देता है । (3) लोहे के बर्तन का इस्तेमाल ना करें  पितृ पक्ष में पितल या तांबे के बर्तनों को पूजा और तर्पण आदि के लिए इस्तेमाल करना चाहिए । लोहे के बर्तनों की मनाही है, उन्हें अशुभ माना जाता है । (4) नया समान ना खरीदें कहा जाता है की पितृ पक्ष के दिन भारी होते हैं।  ऐसे में कोई नया काम न करें और नया समान नही खरीदना चाहिए जैसे कपड़े, वाहन, मकान आदि । (5) दूसरे का दिया अन्न ना खायें  मान्यता है श्राद्ध करने वाले व्यक्ति 15 दिन तक दूसरे के घर का बना खाना नही खाना चाहिए । ज्योतिष
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